दिव्य विचार: शिक्षकों के लिए ध्यान

एक शिक्षक को अपने मन, बुद्धि व कर्म पर  विचार अवश्य करना चाहिए। शिक्षक के मन में स्वच्छता या दिव्यता होती है तो बुद्धि उस  कर्म का सही निर्णय करती है। जब बुद्धि सही  निर्णय करती है तो कर्म अपने आप श्रेष्ठ,  सुखदायी और परोपकारी होता है परन्तु जब भाव  दिव्य नहीं होकर मलीनता लिए होता है तो मन में  उठने वाले प्रत्येक विचार स्वच्छता की बजाय  मलीनता और गलत चीजों के सन्दर्भ में ज्यादा  प्रभावशाली होता है। उस वक्त मानव बुद्धि  निर्णय देते समय मलीनता के सामने झुक जाती  है, और जो कर्म होता है वह गलत, दुखदायी  और अनिष्टकारी होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने  गीता में कहा है कि हे अर्जुन! मन की मलीनता  मनुष्य को सही, पुण्य और दैवी (अच्छे)  संस्कारों से दूर ले जाती है। ये अनिष्टकारी कर्मों से बनने वाले  संस्कार आत्मा व मन पर हावी व प्रभावी होते  हैं। जिस मनुष्य की सोच, विचार व कर्म आसुरी  या खराब प्रवृत्ति की श्रेणी वाला होता है। जो  दूसरों को कष्ट देकर स्वयं को उच्च समझते हुए  अभिमान से भर जाता है। शिक्षक को इस प्रकार  की सोच से बचना चाहिए। शिक्षक अपने दिव्य  विचारों, स्वच्छता व सकारात्मक सोच से अपने  विद्यार्थियों के मन, बुद्धि व कर्म में स्वच्छता  लाने का प्रयास सदैव कर सकता है। ऐसे  विद्यार्थी राष्ट्र व देश के लिए बहुउद्देशीय एवं  उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

समझें, सही और गलत में भेद- एक  शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि  वह अपने विद्यार्थियों में इस गुण का विकास  कैसे करे कि बालक स्वयं ही सही व गलत तथ्य  में  भेद  कर  सके।  मन  एवं  बुद्धि  में  सही  सकारात्मक  सोच  के  साथ  स्वच्छता  और  विचारों में दिव्यता आए। स्वच्छता व दिव्यता  आने पर कर्म स्वयं ही श्रेष्ठ व सुखदायी होंगे।  शिक्षक  द्वारा  दिखाया  गया  यही  सकारात्मक  सोच का मार्ग विद्यार्थियों को उच्च व उज्ज्वल  भविष्य की रोशनी और सही रास्ता दिखाने का  आधार होता है। मानव जीवन और राष्ट्र का यही  उद्देश्य है कि उसे उच्च कोटि की बौद्धिक क्षमता  व दिव्य विचारों से युक्त भावी पी‹ढी मिले। आज के युग में शिक्षक के सामने सबसे  ब‹डी  चुनौती  है  इस  मलीनता  वाले  सुनामी  वातावरण  में  खुद  को  व  बालकों  को  कैसे  विचारवान बनाये रखे; क्योंकि आज के युग में  हवा से लेकर पानी और वातावरण चारों तरफ  अन्य कारकों से प्रभावित है। मानव सन्मार्ग पर  और स्वच्छता के मार्ग पर चलना चाहते हुए भी  अपने आपको असहाय व असमर्थ पाता है।  जीवन के रास्ते में आने वाली अडचनों और  मुश्किलों  का  सामना  करते  हुए  भी  डटकर  मुकाबला करने वाले ऐसे पथिकों की संख्या कम  ही है।

ध्यान जीवन का आवश्यक अंग है-  मानव मन को एक बिन्दु या आलम्बन पर स्थिर  करना अथवा मन, वचन और शरीर की प्रकृति  का निरोध करना ध्यान है। ध्यान की परिभाषा  सरल जरूर है परन्तु प्रायोगिक रूप उतना ही  जटिल प्रतीत होता है। इस ध्यान की प्रक्रिया की  मूल बात है-व्यक्ति का सहज संतुलन। बिना  संतुलन के ध्यान प्रक्रिया का शुभारंभ नहीं माना  जा सकता है। ध्यान एक ऐसी शक्ति है जिसके बिना  व्यक्ति न तो अपने व्यक्तित्व की पहिचान बना  पाता है, और न ही साधना (उपासना) का रहस्य  जान पाता है। मानव जीवन का आध्यात्मिक  दृष्टि से विश्लेषण कर चिंतन किया जाए तो  ध्यान जीवन का आवश्यक अंग है। इसी क्रम में एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों  को ध्यान (मन) से अध्ययन करने के लिये  कहता है। माता-पिता अपने बच्चों को ध्यान से  कार्य करने, वाहन आदि चलाने का आदेश देते  देखे  जा  सकते  हैं।  मानव  द्वारा  ध्यान  से  व  एकाग्रचित्त  होकर  किया  गया  कार्य  सदैव  अच्छा, लाभकारी एवं स्वयं को सुखद परिणाम  देने वाला होता है। असावधानी व बिना ध्यान  से, बिना एकाग्रचित्त हुए किया गया कार्य सही सफल व सुखद परिणाम नहीं देता है। आज के  इस दूषित वातावरण में विशेष रूप से विद्यार्थियों  के मन, विचार को दूषित होने तथा प्रभावित होने  से कैसे बचाया जाए? यदि मानव सन्मार्ग और  स्वच्छता  के  मार्ग  पर  चलते  हुए  भी  अपने  आपको परिस्थितियों के सामने असमर्थ पाता है। गलत तरीकों से पैसा कमाने वाले लोगों  को भ्रम हो जाता है कि आखिर यह मार्ग सही है  या गलत है; क्योंकि बुराइयों और मलीनता के  बहाव में बहने वाला हर व्यक्ति अपने को सही  और बेहतर बताने के लिए पूर्ण प्रयास करने में  लगा रहता हैं। ध्यान प्रक्रिया के द्वारा मानव या  शिक्षक इस मलीनता की बुराई से बचने का  प्रयास कर सकता है।

ध्यान से खुशी और सुख- एक बहाव में  बहते-बहते हमने खुद को एक मशीन बना लिया  है। मूच्र्छित अवस्था में दौ‹डे चले जा रहे हैं। कार्य  कुछ कर रहे होते हैं परन्तु हमारा मन हम से दूर  कहीं और ही यात्राएँ कर रहा होता है। उसी  दृष्टिकोण को बदल कर स्वयं पर टिकता है तो  हर पल, हर साँस हम होशपूर्वक जीने लगते हैं।  यही वर्तमान में जीना है। हम चाहे भविष्य की  योजना बनाएँ तथा भूतकाल की घटनाओं का  विश्लेषण करें; परन्तु सब होशपूर्वक करें; पूर्ण  सजगता व सावधानी से करें। यही वर्तमान में  जीने का अर्थ है। वर्तमान में जीना एक कला है।  इसलिए भगवान महावीर व बुद्ध ने ‘ध्यानङ्क से  इस जीने की कला को हासिल करने का मार्ग  दिखाया है।  जब  व्यक्ति  सजगता  से  जीवन  जीना  आरम्भ करता है तो उसका भटकाव स्वयं ही  निषिद्ध हो जाता है। वह ध्यान की प्रक्रिया से  क्रोध,  लोभ,  अहंकार,  मोह,  माया  आदि  प्रवृत्तियों तथा समस्त राग-द्वेषों से धीरे-धीरे  मुक्त होता हुआ सच्चे आनन्द की ओर ब‹ढता  चला जाता है। इसी से मानव को खुशी व सुख  मिलता है। उस आन्तरिक खुशी व सुख को  शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता है केवल महसूस  किया जा सकता है।

मानव मन को समझना- शिक्षा में हम  विद्यार्थियों को तकनीकी और शरीर विकास की  बात, शरीर रचना की बात सिखाते हैं। मानव  बुद्धि को तेज करना सिखाते हैं परन्तु मन की बात  कोई नहीं करता, अध्यात्म में आत्मा की बात तो  बहुत  दूर  की  बात  है।  मानव  जीवन  चलता  किससे है? मन से चलता है। आप पढ रहे हैं  क्योंकि कि आपके मन में एक इच्छा है। अगर  इच्छा या चाह नहीं होती तो आप पढने नहीं  जाते। जब मन में इच्छा नहीं होती तो बुद्धि काम  नहीं करेगी, बुद्धि के काम नहीं करने से शरीर भी  काम  नहीं  करेगा।  अतः  बुद्धि  व  शरीर  दोनों  साधन हैं- उस इच्छा को पूरी करने के। मन को सारे दुख-सुख महसूस होते है,  अच्छा है या बुरा है यह भी मन को महसूस होता  है। प्रेम, दया, करुणा, स्नेह, वात्सल्य ये सारे  विषय मन से जुडे हुए हैं। अगर मानव मन को  नहीं समझता तो उसने अपने जीवन को नहीं  समझा, फिर चाहे व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान,  बडे पद पर आसीन व धनाढ्य हो। बुद्धि से कैसे पकडते हैं मन को- बिना  किसी शब्द के, बिना किसी भाषा के मन अपने  आपको बिम्बित करता है और जिसका मन जहाँ  जुडा हुआ है वो बात को समझ जाता है। शिक्षक  यह प्रयास करता है कि विद्यार्थी (बालक) कक्षा  में विषय अध्ययन के लिए मन से जुडे क्योंकि  मन से ही शुद्ध और श्रेष्ठ संकल्पों का विचार  प्रवाह होने लगता है। बालक विषय समझकर  सम्पूर्ण  विषयवस्तु  को  याद  रखने  का  प्रयास  करता है। अच्छे कर्मों से हम सुखी होंगे तो निश्चित  ही समाज, राष्ट्र को इसका लाभ मिलेगा। मन  की  स्वच्छता  प्रत्येक  बालक  के  लिए  होना  उसकी मन व आत्मा के शाश्वत मूल्यों के लिए  आवश्यक  है।  अतः  प्रत्येक  माता-पिता  व  शिक्षक इसकी तलाश करने में बालकों का पूर्ण  मार्गदर्शन कर व सही राह दिखाने में सहयोग  करते हैं। बालक चाहे कैसे भी खराब परिवेश में  रहता हो परन्तु स्वच्छता (मन, शरीर, आत्मा व  सोच की) उसे पसन्द आती है। इसलिए शिक्षक  व माता-पिता, अभिभावकों को अपने कर्म व  कत्र्तव्य-संकल्पों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।